कोरबा:–निष्पक्षता, संवेदनशीलता और न्यायिक अनुशासन की कार्यशैली को मिली नई ऊंचाई—कोरबा न्यायिक परिवार ने दी भावभीनी विदाई

न्यायाधीश की पहचान केवल फैसलों से नहीं, बल्कि न्याय के प्रति निष्ठा, व्यवहार की निष्पक्षता और न्यायपालिका के प्रति कायम किए गए विश्वास से होती है। कोरबा के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री संतोष शर्मा का कार्यकाल इसी न्यायिक सोच की एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में याद किया जाएगा। पदोन्नति के बाद छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर में नई जिम्मेदारी संभालने जा रहे श्री शर्मा के सम्मान में आयोजित विदाई समारोह भावनाओं, सम्मान और न्यायिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का साक्षी बना।
विदाई नहीं, न्यायिक यात्रा के नए अध्याय का शुभारंभ
समारोह में न्यायिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने श्री शर्मा के कार्यकाल को याद करते हुए कहा कि न्यायिक पद अपने आप में प्रतिष्ठा का विषय जरूर है, लेकिन उससे कहीं बड़ी जिम्मेदारी संविधान, कानून और आम नागरिक के विश्वास की रक्षा करना है।
श्री शर्मा ने अपने कार्यकाल में न्यायिक कार्यों के साथ प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए न्यायालयीन व्यवस्था को प्रभावी बनाने पर जोर दिया। लोक अदालत, विधिक जागरूकता और समझौता आधारित न्याय की दिशा में लगातार गतिविधियां संचालित हुईं।
समारोह में न्यायिक परिवार की गरिमामयी मौजूदगी

कोरबा न्यायिक व्यवस्था से जुड़े प्रमुख न्यायिक अधिकारी उपस्थित रहे। इनमें—
गरिमा शर्मा, प्रथम जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश, कोरबा;
डॉ. ममता भोजवानी, जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश/एफटीसी-पॉक्सो;
सुनील कुमार नन्दे, तृतीय जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश, अविनाश तिवारी श्रम न्यायाधीश श्रम न्यायालय सुश्री सीमा प्रताप चंद्रा जिला एवं सत्र न्यायाधीश एफटीसी कु मयूर गुप्ता मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ,सत्यानंद प्रसाद तृतीय व्यवहार न्यायाधीश वरिष्ठ श्रेणी, कु डाली ध्रुव द्वितीय व्यवहार न्यायाधीश फर्स्ट श्रेणी सोनी तिवारी प्रथम व्यवहार न्यायाधीश वरिष्ठ श्रेणी कु कुमुदिनी गर्ग प्रथम व्यवहार न्यायाधीश कनिष्ठ श्रेणी, कु डिंपल सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण कोरबा सहित न्यायिक अधिकारी एवं न्यायिक कर्मचारी उपस्थित रहे।
इसके अलावा लीलाधर सारथी विशेष न्यायाधीश! एसटी/एससी तथा अन्य अधिकारियों लीगल एड डिफ़ेंस कौंसिल पैरा लीगल वालंटियर्स की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

न्याय का मतलब केवल फैसला नहीं –विश्वास भी है
विदाई समारोह ने एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी सामने रखा न्यायपालिका की सबसे बड़ी ताकत आखिर क्या है? जवाब स्पष्ट है निष्पक्षता। कानून की नजर में हर व्यक्ति समान है न्यायालय में स्थितियां न्याय के तराजू को प्रभावित नहीं कर सकती वास्तविक सफलता तभी है जब कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी अदालत की चौखट पर खड़े होकर विश्वास कर सके कि उसकी बात सुनी जाएगी और कानून उसके साथ खड़ा होगा।
श्री शर्मा के कार्यकाल में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से लोक अदालत और समझौता आधारित विवाद समाधान को भी प्राथमिकता दी गई न्याय का उद्देश्य केवल मुकदमे का अंतिम फैसला नहीं बल्कि जहां संभव हो वहां विवाद को संवाद सहमति और समझौता के माध्यम से समाप्त कर सामाजिक सौहार्द को बचाना भी है। इसीलिए लोक अदालत को "न हार, न जीत--समाधान" की न्याय व्यवस्था कहा जाता है।
अदालत बदल रही है न्याय का धर्म नहीं अब श्री संतोष शर्मा की न्यायिक यात्रा कोरबा से छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय बिलासपुर की ओर बढ़ रही है जिम्मेदारी का दायरा बढ़ेगा लेकिन न्याय का मूल सिद्धांत वही रहेंगे *संविधान सर्वोपरि, कानून सर्वोपरि और न्याय सर्वोपरि+*
भावुक हुआ न्यायिक परिवार
विदाई समारोह में वक्ताओं ने श्री शर्मा के साथ काम करने के अनुभवों को साझा किया वातावरण में सम्मान के साथ भावुकता दिखाई दी न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों ने उनके उज्जवल भविष्य की कामना की। नाजिर दिनेश टेगनवार ने स्वागत भाषण दिया जबकि कार्यक्रम के संचालन में वरिष्ठ न्यायालय प्रबंधक अमित कुमार पाठक की भूमिका सराहनीय रही कार्यक्रम में न्यायिक अधिकारियों कर्मचारियों एवं न्यायिक व्यवस्था से जुड़े अन्य लोगों की सहभागिता रही
