नई दिल्ली:– हमारी संस्कारधानी के बड़ों से सुना है कि दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है।
वसुधैव कुटुम्बकम् अर्थात संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार है
सनातन संस्कृति में जीव-जंतु और पेड़-पौधों की पूजा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का एक गहरा और सुविचारित माध्यम है। यही दृष्टि “वसुधैव कुटुम्बकम् अर्थात संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार है जैसे महान सिद्धांत को जन्म देती है। जब वृक्ष, नदियाँ, पशु-पक्षी और धरती को पूजनीय माना जाता है, तो उनका संरक्षण स्वाभाविक रूप से जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाता है।
प्रकृति संरक्षण के सशक्त और प्रभावी माध्यम भी
यह एक ऐसी सांस्कृतिक व्यवस्था है, जिसमें पर्यावरण की रक्षा किसी नियम या कानून के भय से नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव और कर्तव्यबोध से होती है। इसी कारण हमारे त्योहार और व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण के सशक्त और प्रभावी माध्यम भी हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार रागिनी श्रीवास्तव का कहना है कि इस दिन विवाहित स्त्रियां वट (बरगद) वृक्ष की पूजा कर अपने पति की दीर्घायु तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इस व्रत का आधार सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा है, जिसमें सावित्री ने अपने धैर्य, तप और बुद्धिमत्ता के बल पर यमराज से अपने पति के प्राण वापस प्राप्त किए।
भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को जीवन का अभिन्न अंग
वट सावित्री व्रत, तुलसी विवाह, नाग पंचमी, छठ पूजा और गोवर्धन पूजा आदि पर्व इस बात के जीवंत उदाहरण हैं कि भारतीय संस्कृति ने पर्यावरण को जीवन का अभिन्न अंग बनाया है। ज्येष्ठ अमावस्या को मनाया जाने वाला वट सावित्री व्रत नारी-श्रद्धा, पारिवारिक मूल्यों और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
बरगद का वृक्ष अमरत्व, स्थायित्व और जीवन-शक्ति का प्रतीक
यह कथा नारी-शक्ति, संकल्प और अटूट प्रेम की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। वट वृक्ष के नीचे की गई उनकी साधना के कारण यह वृक्ष विशेष रूप से पूजनीय बन गया। बरगद का वृक्ष अमरत्व, स्थायित्व और जीवन-शक्ति का प्रतीक है। पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह अत्यंत महत्वपूर्ण है यह वायु को शुद्ध करता है, तापमान संतुलित करता है और अनेक जीवों को आश्रय प्रदान करता है। इसकी जटाएँ मिट्टी के कटाव को रोककर पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में सहायक होती हैं।
लोगों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदार बनाती है
वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष की परिक्रमा और धागा बाँधना इस बात का प्रतीक है कि मानव जीवन प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह हमें सहअस्तित्व और संतुलन का संदेश देता है। सनातन परंपरा में पीपल, तुलसी, नीम आँवला, केला आदि वृक्षों की पूजा का विधान भी इसी सोच का परिणाम है। यह आस्था केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी है, जो लोगों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदार बनाती है।
विज्ञान और तकनीक के साथ पर्यावरण संकट भी तेजी से बढ़ रहा
आज का युग विज्ञान और तकनीक का है, लेकिन इसके साथ-साथ पर्यावरण संकट भी तेजी से बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, वनों की कटाई और प्रदूषण जैसी समस्याएँ मानव अस्तित्व के लिए चुनौती बन चुकी हैं। ऐसे समय में वट सावित्री जैसे पर्व हमें अपनी परंपराओं के महत्व को समझने का अवसर देते हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति संरक्षण के लिए कितनी सुंदर और प्रभावी परंपराएँ बनाई थीं।यदि हम इन परंपराओं को सही रूप में अपनाएँ, तो पर्यावरण संरक्षण एक सहज और स्वाभाविक प्रक्रिया बन सकती है।
व्रत नारी-शक्ति का भी एक महान प्रतीक
वट सावित्री व्रत नारी-शक्ति का भी एक महान प्रतीक है। जो यह सिद्ध करती है कि नारी केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत सशक्त है। उसने अपने साहस और बुद्धिमत्ता से मृत्यु के देवता को भी पराजित कर दिया। वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस जीवनदृष्टि का प्रतीक है जिसमें नारी सम्मान, परिवार, प्रकृति और मानवता सभी को समान महत्व दिया गया है। जब पूरी धरती हमारा परिवार है, तब प्रकृति की रक्षा ही हमारा सर्वोच्च धर्म बन जाता है। प्रकृति का संरक्षण ही मानव जीवन का संरक्षण है। यही सनातन संस्कृति का सच्चा संदेश है।
