कोरबा:- नया बस स्टैंड, ट्रांसपोर्ट नगर परिसर में संचालित शिवाय हॉस्पिटल में मरीज के उपचार को लेकर कथित लापरवाही से जुड़ा एक और मामला सामने आया है। इस मामले को लेकर एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में एक पीड़ित परिवार की ओर से अस्पताल की व्यवस्था और मरीज को समय पर वेंटिलेटर सुविधा नहीं मिलने को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। वीडियो में कही गई बातों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।
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परिवार की ओर से लगाए गए आरोप के मुताबिक, गंभीर हालत में मरीज को लेकर परिजन शिवाय हॉस्पिटल पहुंचे थे। वहां कथित तौर पर उन्हें वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं होने की जानकारी दी गई। इसके बाद परिजन मरीज को लेकर अन्य अस्पतालों में भी वेंटिलेटर की तलाश में भटकते रहे। आरोप है कि करीब डेढ़ घंटे बाद उन्हें दोबारा शिवाय हॉस्पिटल में वेंटिलेटर उपलब्ध होने की जानकारी मिली।
यहीं से पूरे मामले में कई सवाल खड़े हो गए हैं।
परिजनों की ओर से अस्पताल प्रबंधन से जुड़े स्वप्निल झा और आरएमओ की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। उनका सवाल है कि यदि डेढ़ घंटे पहले वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं था, तो बाद में अचानक यह सुविधा कैसे उपलब्ध हो गई? क्या इस दौरान किसी दूसरे मरीज को वेंटिलेटर से हटाया गया था? यदि ऐसा हुआ तो वह मरीज कौन था और उसे किस परिस्थिति में वेंटिलेटर से हटाया गया?
इन सवालों के जवाब अस्पताल प्रबंधन की ओर से स्पष्ट रूप से सामने आना बाकी हैं।
वायरल वीडियो में परिवार की ओर से यह भी आरोप लगाया गया है कि अस्पताल में मरीजों के उपचार को लेकर सेवा से अधिक बिलिंग को प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि, इस आरोप की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और अस्पताल प्रबंधन का पक्ष इस रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं है।
मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि अस्पताल में वेंटिलेटर की सुविधा मौजूद थी और मरीज की हालत गंभीर थी, तो उसे समय पर यह सुविधा क्यों नहीं मिल सकी? गंभीर मरीज के मामले में कुछ समय का अंतर भी महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसे में अस्पताल प्रबंधन को पूरे घटनाक्रम की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि उस समय कितने वेंटिलेटर उपलब्ध थे, कितने मरीज वेंटिलेटर पर थे और संबंधित मरीज को तत्काल वेंटिलेटर उपलब्ध क्यों नहीं कराया जा सका।
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि अस्पताल को 100 बिस्तरों वाले अस्पताल के रूप में प्रचारित किया जाता है। ऐसे में मरीज और उनके परिजन स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा करते हैं कि गंभीर परिस्थितियों में जरूरी जीवनरक्षक सुविधाएं समय पर उपलब्ध हों।
सवाल अस्पताल की सुविधाओं और दावों के बीच किसी भी संभावित अंतर का है। यदि सुविधा उपलब्ध है तो गंभीर मरीज को समय पर मिले और यदि उपलब्ध नहीं है तो परिजन को स्थिति साफ-साफ बताई जाए, ताकि वे बिना समय गंवाए दूसरे अस्पताल में उपचार की व्यवस्था कर सकें।
फिलहाल वायरल वीडियो में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। शिवाय हॉस्पिटल प्रबंधन का पक्ष मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
सवाल किसी अस्पताल को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि गंभीर मरीज को समय पर उपचार और जीवनरक्षक सुविधा मिलने का है। आखिर मरीज के इलाज में ऐसी स्थिति क्यों बने कि परिजनों को अस्पताल-दर-अस्पताल भटकना पड़े?
