नई दिल्ली:– आज शहरों में गंदगी फैलाने वाले पक्षी के रूप में देखे जाने वाले कबूतर कभी इंसानों के सबसे भरोसेमंद साथी हुआ करते थे। नई रिसर्च में खुलासा हुआ है कि इंसानों ने करीब 3500 साल पहले ही कबूतरों को पालतू बनाना शुरू कर दिया था। यह खोज मानव इतिहास के उस अध्याय को सामने लाती है, जिसमें कबूतर संचार, युद्ध, खेती और धार्मिक परंपराओं का अहम हिस्सा थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसानों और कबूतरों का रिश्ता पहले की सोच से लगभग 1000 साल ज्यादा पुराना है।
जर्नल “एंटीक्विटी” में प्रकाशित इस रिसर्च के अनुसार, कबूतरों का उपयोग पुराने समय में संदेश पहुंचाने के लिए किया जाता था और युद्धों में उनकी बड़ी भूमिका होती थी। उस दौर में जब न टेलीफोन था और न इंटरनेट, तब कबूतर ही दूर-दराज इलाकों तक खबर पहुंचाने का सबसे भरोसेमंद जरिया थे। रिसर्च की मुख्य लेखिका और नीदरलैंड की ग्रोनिंगन यूनिवर्सिटी की बायोआर्कियोलॉजिस्ट एंडरसन कार्टर ने कहा कि इंसानों का कबूतरों से दूर होना मानव इतिहास में बहुत हाल की बात है।
रिसर्च में बताया गया कि औद्योगिक क्रांति और आधुनिक तकनीकों के आने के बाद कबूतरों की उपयोगिता कम होती चली गई। टेलीग्राफ और टेलीफोन के आविष्कार के बाद उनका संदेशवाहक के रूप में इस्तेमाल लगभग खत्म हो गया। हालांकि हजारों वर्षों तक इंसानों के साथ रहने के कारण कबूतर शहरों और मानव बस्तियों के आसपास ही बने रहे। बाद में बड़े शहरों के विस्तार के साथ लोगों ने उन्हें गंदगी और बीमारियां फैलाने वाला पक्षी मानना शुरू कर दिया।
इस शोध के लिए वैज्ञानिकों की टीम साइप्रस के हाला सुल्तान टेक्के नामक पुरातात्विक स्थल पर पहुंची, जहां उन्हें 159 प्राचीन कबूतरों की हड्डियां मिलीं। वैज्ञानिकों ने इन हड्डियों का विश्लेषण कर यह पता लगाने की कोशिश की कि कबूतर क्या खाते थे और उनका इंसानों से कितना संबंध था। जांच में सामने आया कि उन कबूतरों का भोजन इंसानों के भोजन से काफी मिलता-जुलता था, जिससे यह साबित हुआ कि वे इंसानों के साथ रहकर पाले जाते थे।
