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आखिर भगवान महाकाल को क्यों अत्यंत प्रिय है भस्म, जानें इससे जुड़ी खास बातें और महत्व…

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मध्यप्रदेश:– उज्जैन स्थित महाकालेश्वर की भस्म आरती विश्वप्रसिद्ध है। जिसे देखने के लिए दूर दर्ज से आए दिन भक्त उज्जैन पहुंचते है। भस्म आरती का काफी पौराणिक महत्व है. आरती में श्मशान से लाई गई चिता की भस्म से भगवान शिव का श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद आरती की जाती है। यह आरती केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह जीवन के एक गहरे सत्य मृत्यु का प्रतीक है। महाकाल मंदिर ही एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जहां शिव का यह अनूठा शृंगार किया जाता है और भस्म अर्पित की जाती है, जो उन्हें अत्यंत प्रिय है।
आत्मा अमर है

शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव को भस्म इसलिए अत्यंत प्रिय है क्योंकि यह नश्वरता (मृत्यु) और अनासक्ति का प्रतीक है। राख इस बात का स्मरण कराती है कि सांसारिक मोह-माया, अहंकार और शरीर नश्वर हैं और अंत में सब उसी में विलीन हो जाते हैं। भस्म धारण करके वे यह संदेश देते हैं कि आत्मा अमर और सत्य है।

इन चीजों से मिलकर बनती है भस्म

महाकाल पर चढ़ने वाली भस्म कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलताश और बेर के वृक्ष की लकड़ियों को एक साथ जलाया जाता है. इस दौरान उचित मंत्रोच्चारण किए जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार दूषण नाम के राक्षस ने उज्जैन नगरी में तबाही मचा दी थी. यहां के ब्राम्हणों ने भगवान शिव से इसके प्रकोप को दूर करने की विनती की. भगवान शिव ने दूषण को चेतावनी दी लेकिव वो नहीं माना. क्रोधित शिव यहां महाकाल के रूप में प्रकट हुए और अपनी क्रोध से दूषण को भस्म कर दिया. माना जाता है कि बाबा भोलेनाथ ने यहां दूषण के भस्म से अपना श्रृंगार किया था. इसलिए आज भी यहां महादेव का श्रृंगार भस्म से किया जाता है.