नई दिल्ली;- वैज्ञानिकों द्वारा पहले यह माना जाता था कि चेतना केवल मस्तिष्क के न्यूरॉन्स की रासायनिक प्रक्रिया है, परंतु आधुनिक शोध मानवीय चेतना के विषय में अद्भुत तत्व सामने लाते हैं, जिसके अनुसार, चेतना मस्तिष्क की न्यूरॉन्स कोशिकाओं के अंदर मौजूद अत्यंत सूक्ष्म नलिकाओं यानि माइक्रोट्यूब्यूल्स के क्वांटम स्तर पर घटित होती है।
पितृपक्ष का समय एक सेतु के रूप में कार्य करता है, पितृपक्ष की 16 तिथियां उस खगोलीय कालखंड, भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या, में आती हैं, जब पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य की विशिष्ट खगोलीय स्थिति के कारण इलेक्ट्रोमैग्नेटिक और गुरुत्वीय तरंगों में परिवर्तन होता है। इस काल में किया गया पितृ अनुष्ठान कुल के उस मॉर्फिक फील्ड को पुनर्जीवित कर देता है। मॉर्फिक फील्ड शेल्ड्रेक की परिकल्पना है कि प्रकृति में रूपों और व्यवहारों के पैटर्न किसी प्रकार के अदृश्य सूचना-क्षेत्र के माध्यम से संरक्षित और दोहराए जा सकते हैं।
दृश्य जगत के पीछे कार्यरत उन अदृश्य और सूक्ष्म शक्तियों को समझना, जो मानव से लेकर जीव-जंतुओं और वनस्पतियों तक को प्रभावित करती हैं, आध्यात्मिक विज्ञान की प्रमुख जिज्ञासाओं में से एक है। जब हव्य या कव्य अग्नि में आहुति के रूप में दिया जाता है, तो अग्निदेव और वायुदेव उस भोजन के सूक्ष्म तेज को पितृलोक तक प्रेषित करते हैं। जब गाय, कौआ, कुत्ता या भूखे जीव उस अन्न को संतुष्ट होकर खाते हैं, तो उनसे उत्पन्न सद्भाव और तृप्ति की तरंगें सीधे पितरों की चेतना से जुड़ती हैं, इसे शास्त्रों में भावनात्मक व आत्मिक ऊर्जा का प्रत्यक्ष हस्तांतरण माना गया है।
मत्स्य पुराण और गरुड़ पुराण के अनुसार, पूर्वज वर्तमान में जिस किसी भी लोक या योनि, जैसे, देव, गंधर्व, मनुष्य, या पशु में हों, उनके नाम और गोत्र के संकल्प से छोड़ा गया अन्न उसी रूप के अनुकूल आहार में स्वतः रूपांतरित होकर उन्हें प्राप्त हो जाता है।
