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सात वर्षीय मासूम से हुई दरिंदगी और हत्या मामले में जिला अधिवक्ता संघ महिला उपाध्यक्ष ने उठाए गंभीर सवाल; फास्ट ट्रैक सुनवाई, सशक्त अभियोजन दोषी को कठोर सजा की मांग

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        कोरबा/ जिले के रजगामार में सात वर्षीया मासूम बालिका साथ हुई दरिंदगी और हत्या की घटना पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है। मासूम बेटी घर से राशन लेने निकली थी! लौटने की उम्मीद परिजन कर रहे थे, नहीं आने पर खोज बीन सुरू हुई! तीन दिन बाद झाड़ियों में शव पाया गया। इस हृदयविदारक घटना ने बच्चों की सुरक्षा, महिला अपराधों के प्रति सामाजिक संवेदनशीलता और न्याय व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
 मामले में आरोपी की गिरफ्तारी बाद जहां पुलिस की कार्रवाई चर्चा में है, वहीं जिला अधिवक्ता संघ कोरबा की महिला उपाध्यक्ष उर्मिला भगत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि आरोपी की गिरफ्तारी न्याय की शुरुआत है, उसका अंतिम पड़ाव नहीं। असल संतुष्टी तब होगी, जब मामले में निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई हो, अभियोजन पक्ष मजबूती से पैरवी करे और अदालत में दोषी को कानून अनुसार कठोर सजा मिले। रजगामार की घटना को केवल एक आपराधिक वारदात मानकर भुलाया नहीं जा सकता। यह समाज की सुरक्षा व्यवस्था और सामूहिक जिम्मेदारी से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। पुलिस आरोपी को गिरफ्तार किया है, लेकिन अब जांच से लेकर न्यायालय में सुनवाई तक प्रत्येक चरण को गंभीरता से पूरा करना जरूरी है।
      उन्होंने मामले में फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) की रिपोर्ट समय पर प्राप्त करने, साक्ष्यों को सुरक्षित रखने, जांच में किसी भी प्रकार की लापरवाही से बचने लागू कानून तहत मजबूत अभियोजन सुनिश्चित करने पर जोर दिया। किसी गंभीर आपराधिक मामले में शुरुआती कार्रवाई जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी है कि आगे की कानूनी प्रक्रिया भी पूरी मजबूती और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़े।
    फास्ट ट्रैक न्यायालय में सुनवाई की मांग करते हुए कहा कि पीड़ित परिवार को न्याय दिलाना प्रशासन, पुलिस, अभियोजन और न्याय व्यवस्था की साझा जिम्मेदारी है। हालांकि, दोषसिद्धि और सजा का निर्णय न्यायालय साक्ष्यों तथा कानून के आधार पर करता है ।महिला उत्पीड़न और बाल सुरक्षा के मुद्दों पर काम करने वाली सामाजिक संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि महिला सशक्तिकरण, बाल अधिकार और सामाजिक न्याय की बात करने वाली संस्थाओं को ऐसी घटनाओं में पीड़ित परिवार के साथ खड़ा होना चाहिए।
   रजगामार की मासूम एक साधारण मजदूर परिवार से थी। ऐसे परिवारों के बच्चों की सुरक्षा, उनकी समस्याओं और उन्हें न्याय दिलाने के प्रयासों को भी उतनी ही गंभीरता मिलनी चाहिए, जितनी अन्य मामलों को मिलती है। सामाजिक न्याय की आवाज केवल चुनिंदा घटनाओं तक सीमित रहनी चाहिए? आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों की सुरक्षा और न्याय की मांग को समान प्राथमिकता नहीं मिलनी चाहिए?

       अधिवक्ता संघ उपाध्यक्ष उर्मिला भगत ने सामाजिक संगठनों से अपील की है कि वे इस मामले में पीड़ित परिवार को कानूनी जानकारी, आवश्यक सहयोग और न्याय की प्रक्रिया को समझने में मदद करें।महिला एवं बाल सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर संस्थाओं की सक्रियता केवल कार्यक्रमों और अभियानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि जरूरत के समय जमीनी स्तर पर दिखाई देनी चाहिए किसी जघन्य अपराध के बाद जनता का गुस्सा स्वाभाविक है, लेकिन यह जरूरी है कि यह आक्रोश न्याय की मांग और बच्चों की सुरक्षा के मामले की कानूनी प्रक्रिया पर शांतिपूर्ण और जिम्मेदार तरीके से नजर रखें। पीड़ित परिवार को सहयोग दें, जांच से संबंधित अपुष्ट सूचनाएं प्रसारित न करें और न्यायालयीन प्रक्रिया का सम्मान करते हुए जवाबदेही की मांग करते रहें। 
    उर्मिला भगत ने कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों और श्रमिक बस्तियों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई। उन् बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करना केवल अभिभावकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है।स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने, बच्चों को सुरक्षित और असुरक्षित परिस्थितियों की पहचान के बारे में उम्र के अनुरूप जानकारी देने, संदिग्ध गतिविधियों की सूचना पुलिस तक पहुंचाने तथा संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने जैसे कदम महत्वपूर्ण हैं।
    उर्मिला भगत ने कहा कि ऐसी घटनाओं में पीड़ित परिवार केवल कानूनी लड़ाई ही नहीं लड़ता, बल्कि गहरे मानसिक और सामाजिक संकट से भी गुजरता है। इसलिए परिवार की निजता और गरिमा का सम्मान करना, अनावश्यक प्रचार से बचना तथा जरूरत के अनुसार कानूनी और प्रशासनिक सहायता उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।

“मासूम की मौत सिर्फ एक खबर बनकर न रह जाए।

उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल एक आरोपी के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ना चाहिए, जिसमें बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हो और किसी पीड़ित परिवार को न्याय के लिए अकेले संघर्ष न करना पड़े।