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खुशियों से भरा रहता है ऐसा परिवार, बच्चा बच्चा करता है तरक्की

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नई दिल्ली : जीवन के विपरित समय में यदि कोई सुरक्षा और समर्थन करता है, तो वह परिवार है। इंसान का परिवार ही मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, जिसके चलते लक्ष्य पर उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। आचार्य चाणक्य के अपने नीति शास्त्र में सुखी परिवार का उल्लेख किया है, जिसका अध्ययन करने से एक उचित मार्गदर्शन की प्राप्ति होती हैं। उनका मानना है कि ‘मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसञ्चितम्। दम्पत्येः कलहो नाऽस्ति तत्र श्रीः स्वयमागता ।। इसका अर्थ है कि जिस घर में मूर्ख लोगों की बजाय गुणवानों का आदर-सम्मान होता है, वहां हमेशा खुशियां रहती हैं। साथ ही ऐसे परिवार के लोग तरक्की भी करते हैं। ऐसे ही कई अन्य श्लोक के माध्यम से चाणक्य ने सुखी परिवार का वर्णन किया है, आइए जानते हैं।

यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दाऽनुगामिनी ।
विभवे यश्च सन्तुष्टस्तस्य स्वर्ग इहैव हि ।।
चाणक्य नीति के इस श्लोक के अनुसार जिसका पुत्र वश में है, स्त्री भी इच्छा के अनुसार काम करती है, और व्यक्ति अपने कमाए हुए धन से संतुष्ट है, ऐसे लोग हमेशा सुखी रहते है। साथ ही ऐसे परिवार में खुशियों का वास भी बना रहता है।

ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः स पिता यस्तु पोषकः ।
तन्मित्रं यस्य विश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः ।।
आचार्य चाणक्य के इस श्लोक का अर्थ है कि वही गृहस्थ सुखी है, जिसकी संतान उसके वश में है, और संतान सभी नियम कानून का पालन करती है। चाणक्य के अनुसार अगर संतान पिता की आज्ञा का पालन नहीं करती, तो ऐसे घर में हमेशा क्लेश और दुख बना रहता है। इसलिए व्यक्ति को हमेशा पिता की आज्ञा का पालन करना चाहिए। जिस घर में पिता की बातों का पालन होता है, वहां हमेशा सुख-समृद्धि का वास होता है।

नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः ।।
चाणक्य नीति के इस श्लोक का अर्थ है कि बचपन में बच्चों को जैसी शिक्षा दी जाएगी, वैसे ही बच्चों का विकास होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे अपनी संतान को सही मार्ग पर चलने को प्रेरित करें, और अच्छे गुणों की शिक्षा दें। उनका मानना है कि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा होती है।